बेस्ट 5+ शेखचिल्ली की हास्य कहानियां | Sheikh Chilli Story

शेखचिल्ली की हास्य कहानियां: हम अपने जीवन कई बार लोगों से सुनते हैं कि फलाना शख्स तो शेखचिल्ली की तरह बात कर रहा है। यह वो नाम है, जो अपनी कल्पनाओं और खयाली पुलाव के लिए प्रसिद्ध रहा है। अगर कुरुक्षेत्र महाभारत के लिए प्रसिद्ध है तो उससे कुछ ही दूरी पर स्थित थानेसर शेखचिल्ली के कारनामों के लिए।

शेखचिल्ली के बारे में कौन नहीं जानता वह एक ऐसा पात्र है जो जीवन में हमेशा हंसाने का काम करता है अपनी बेवकूफी की वजह से इसने बहुत से लोगों को हंसाया और बहुत से लोगों के चेहरे पर खुशी लाई।

तो चलिए पढ़ते हैं मियां शेख चिल्ली की गुदगुदाने वाली मजेदार कहानियाँ:-

शेख चिल्ली की हास्य कहानियां (short funny story in hindi)

कैसे नाम पड़ा शेखचिल्ली ? (Sheikh Chilli Story In Hindi)

शेखचिल्ली के बारे में यही कहा जाता है कि उसका जन्म किसी गांव में एक गरीब शेख परिवार में हुआ था। पिता बचपन में ही गुजर गए थे, मां ने पाल-पोस कर बड़ा किया। मां सोचती थी कि एक दिन बेटा बड़ा होकर कमाएगा तो गरीबी दूर होगी।

उसने बेटे को पढ़ने के लिए मदरसे में दाखिला दिला दिया। सब बच्चे उसे ‘शेख’ कहा करते थे। मौलवी साहब ने पढ़ाया, लड़का है तो ‘खाता’ है और लड़की है तो ‘खाती’ है । जैसे रहमान जा रहा है, रजिया जा रही है।

एक दिन एक लड़की कुएं में गिर पड़ी। वह मदद के लिए चिल्ला रही थी। शेख दौड़कर साथियों के पास आया और बोला वह मदद के लिए चिल्ली रही है। पहले तो लड़के समझे नहीं। फिर शेखचिल्ली उन्हें कुएं पर ले गया। उन्होंने लड़की को बाहर निकाला। वह रो रही थी। शेख बार-बार समझा रहा था- ‘देखो, कैसे चिल्ली रही है। ठीक हो जाएगी।

किसी ने पूछा- ‘शेख! तू बार-बार इससे ‘चिल्ली-चिल्ली क्यों कह रहा है?

शेख बोला- ‘लड़की है तो ‘चिल्ली’ ही तो कहेंगे। लड़का होता तो कहता चिल्ला मत।

लड़कों ने शेख की मूर्खता समझ ली और उसे ‘चिल्ली-चिल्ली’ कहकर चिढ़ाने लगे।

उसका तो फिर नाम ही ‘शेखचिल्ली हो गया।

असल बात फिर भी शेख चिल्ली की समझ में न आई। न ही उसने नाम बदलने का बुरा माना।

शेख चिल्ली रेलगाड़ी में (शेख चिल्ली हिन्दी हास्य कहानियाँ)

शेख चिल्ली किसी भी नौकरी में ज्यादा दिन नहीं टिक पाता था. वह कोई न कोई ऐसा कारनामा कर जाता कि उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ता था. इसलिए उसने सोचा कि इस नौकरी में क्या रखा है? मुझे तो मुंबई जाकर हीरो बनना चाहिए. वैसे भी माशा-अल्लाह मैं सजीला-जवान हूँ.

यह बात दिमाग में आते ही उसने मुंबई की टिकट कटा ली. यह पहला अवसर था, जब वह रेलगाड़ी में सफ़र करने वाला था. वह रेलवे स्टेशन पहुँचा और रेल गाड़ी का इंतज़ार करने लगा.

जब रेल गाड़ी आई, तो वह प्रथम श्रेणी के डब्बे में चढ़ गया. प्रथम श्रेणी का डब्बा पूरा खाली था. शेख चिल्ली हैरान हो गया और सोचने लगा – ‘अजीब बात है. ये रेल गाड़ी तो पूरी खाली है. इसमें बस मैं ही बैठा हुआ हूँ. लोग झूठ बोलते हैं कि रेल गाड़ी में बहुत भीड़-भाड़ होती है.’

कुछ देर में रेल गाड़ी चलने लगी. अकेले बैठे-बैठे शेख चिल्ली ऊबने लगा. उसकी आदत बस के सफ़र की थी. वह सोचने लगा कि रेल गाड़ी कहीं रुकेगी, तो बाहर जाकर थोड़ी तफ़री कर लूंगा. लेकिन रेल थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी.

बस के सफ़र के आदी शेख चिल्ली को लगता था कि रेल गाड़ी भी बस की तरह जगह-जगह रुकती होगी. लेकिन कई शहर निकल गए और रेल गाड़ी रुकी ही नहीं. परेशान शेख चिल्ली रेल रोकने के लिए चिल्लाने लगा, “अरे ड्राईवर मियां गाड़ी रोको.”

लेकिन, तब भी रेल नहीं रुकी. शेख चिल्ली मन मसोसकर बैठा रहा.

आखिरकार, जब एक स्टेशन पर रेल गाड़ी रुकी, तो शेख चिल्ली ने बाहर झांककर एक रेल कर्मी को अपने पास बुलाया और उससे कहने लगा, “मियां, ये रेल गाड़ी भी कमबख्त अजीब चीज़ है?”

“क्यों?” रेल कर्मी ने पूछा.

“कितना शोर मचाया मैंने, लेकिन किसी ने गाड़ी नहीं रोकी.” शिकायती अंदाज़ में शेख चिल्ली बोला.

“ये रेल गाड़ी है. बस नहीं कि ड्राईवर या कंडक्टर को आवाज़ लगाईं और गाड़ी रुकवा दी.” रेल कर्मी ने बताया.

“ये मुझे मालूम है.” शेख चिल्ली ने अपनी नादानी छुपाने की कोशिश की.

“तो फिर ये पूछा क्यों?”

“मैंने क्या पूछा?”

“यही कि रेल गाड़ी शोर मचाने पर रूकती क्यों नहीं? तुम्हें पता होना चाहिए कि रेल गाड़ी सिर्फ़ अपने स्टेशन पर ही रूकती है.”

“तुम क्या मुझे बेवकूफ़ समझते हो. मुझे सब मालूम है.” अपनी बेवकूफ़ी छुपाने के लिए शेख चिल्ली बहस करने लगा.

रेल कर्मी भी तैश में आ गया, “अरे, जब सब पता है, तो मुझे बुलाकर ये सब क्यों पूछ रहे हो. ख्वामख्वाह मेरा वक़्त बर्बाद कर रहे हो.”

“मेरी मर्ज़ी. जिससे जो पूछना है, पूछूंगा.”

इस बात पर रेल कर्मी चिढ़ गया और “नॉनसेंस” कहता हुआ जाने लगा।

“अरे नून हम नहीं खाते…..पूरी दावत उड़ाते हैं.” कहते हुए शेखचिल्ली हँसने लगा. इधर रेल गाड़ी भी चल पड़ी।

मियां शेख चिल्ली चले लकड़ियां काटने (Sheikh Chilli Ki Kahaniya)

एक बार मियां शेख चिल्ली अपने मित्र के साथ जंगल में लकड़ियाँ कांटने गए। एक बड़ा सा पेड़ देख कर वह दोनों दोस्त उस पर लकड़ियाँ काटने के लिए चढ़ गए।

मियां शेख चिल्ली अब लकड़ियाँ काटते-काटते लगे अपनी सोच के घोड़े दौड़ने। उन्होने सोचा कि मै इस जंगल से ढेर सारी लकड़ियाँ काटूँगा। उन लकड़ियों को बाज़ार में अच्छे दामों में बेचूंगा। इस तरह मुझे काफी धन-लाभ होगा।

इस काम से मै कुछ ही समय में अमीर बन जाऊंगा। फिर लकड़ियाँ काटने के लिए ढेर सारे नौकर रख लूँगा। काटी हुई लकड़ियों से फर्नीचर का बिज़नस शुरू करूंगा।

कुछ ही दिनों में मै इतना समृद्ध व्यापारी बन जाऊंगा की नगर का राजा मुझ से राजकुमारी का विवाह करवाने के लिए खुद सामने से राज़ी हो जाएगा।

शादी के बाद हम घूमने जायेंगे और एक सुन्दर सी बागीचे में राजकुमारी अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाएंगी…. ख़यालों में खोये हुए मियां शेख चिल्ली ऐसा सोचते-सोचते पेड़ की डाल छोड़ कर सचमुच राजकुमारी का हाथ थामने के लिए अपने हाथ आगे बढाने लगते हैं…तभी अचानक उनका संतुलन बिगड़ जाता है और वो धड़ाम से नीचे ज़मीन पर गिर पड़ते है।

ऊंचाई से गिरने पर मियां शेख चिल्ली के पैर की हड्डी टूट जाती है। और साथ-साथ उनके बिना सिर-पैर के खयाली सपनें भी टूट कर बिखर जाते हैं।

शेखचिल्ली और कुएं की परियां (Sheikh Chilli dikhao)

एक गांव में एक सुस्त और कामचोर आदमी रहता था। काम – धाम तो वह कोई करता न था, हां बातें बनाने में बड़ा माहिर था। इसलिए लोग उसे शेखचिल्ली कहकर पुकारते थे। शेखचिल्ली के घर की हालत इतनी खराब थी कि महीने में बीस दिन चूल्हा नहीं जल पाता था। शेखचिल्ली की बेवकूफी और सुस्ती की सजा उसकी बीवी को भी भुगतनी पड़ती और भूखे रहना पड़ता। एक दिन शेखचिल्ली की बीवी को बड़ा गुस्सा आया। वह बहुत बिगड़ी और कहा,”अब मैं तुम्हारी कोई भी बात नहीं सुनना चाहती। चाहे जो कुछ करो, लेकिन मुझे तो पैसा चाहिए। जब तक तुम कोई कमाई करके नहीं लाओगे, मैं घर में नहीं, घुसने दूंगी।”यह कहकर बीवी ने शेखचिल्ली को नौकरी की खोज में जाने को मजबूर कर दिया। साथ में, रास्ते के लिए चार रूखी – सूखी रोटियां भी बांध दीं। साग – सालन कोई था ही नहीं, देती कहाँ से? इस प्रकार शेखचिल्ली को न चाहते हुए भी नौकरी की खोज में निकलना पड़ा।

शेखचिल्ली सबसे पहले अपने गांव के साहूकार के यहाँ गए। सोचा कि शायद साहूकार कोई छोटी – मोटी नौकरी दे दे। लेकिन निराश होना पड़ा। साहूकार के कारिन्दों ने ड्योढ़ी पर से ही डांट – डपटकर भगा दिया। अब शेखचिल्ली के सामने कोई रास्ता नहीं था। फिर भी एक गांव से दूसरे गांव तक दिन भर भटकते रहे। घर लौट नहीं सकते थे, क्योंकि बीवी ने सख्त हिदायत दे रखी थी कि जब तक नौकरी न मिल जाए, घर में पैर न रखना। दिन भर चलते – चलते जब शेखचिल्ली थककर चूर हो गए तो सोचा कि कुछ देर सुस्ता लिया जाए। भूख भी जोरों की लगी थी, इसलिए खाना खाने की बात भी उनके मन में थी। तभी कुछ दूर पर एक कुआं दिखाई दिया। शेखचिल्ली को हिम्मत बंधी और उसी की ओर बढ़ चले। कुएं के चबूतरे पर बैठकर शेखचिल्ली ने बीवी की दी हुई रोटियों की पोटली खोली। उसमें चार रूखी – सूखी रोटियां थीं। भूख तो इतनी जोर की लगी थी कि उन चारों से भी पूरी तरह न बुझ पाती। लेकिन समस्या यह भी थी कि अगर चारों रोटियों आज ही खा डालीं तो कल – परसों या उससे अगले दिन क्या करूंगा, क्योंकि नौकरी खोजे बिना घर घुसना नामुमकिन था। इसी सोच-विचार में शेखचिल्ली बार – बार रोटियां गिनते और बारबार रख देते। समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए। जब शेखचिल्ली से अपने आप कोई फैसला न हो पाया तो कुएं के देव की मदद लेनी चाही। वह हाथ जोड़कर खड़े हो गए और बोले,”हे बाबा, अब तुम्हीं हमें आगे रास्ता दिखाओ। दिन भर कुछ भी नहीं खाया है। भूख तो इतनी लगी है कि चारों को खा जाने के बाद भी शायद ही मिट पाए। लेकिन अगर चारों को खा लेता हूँ तो आगे क्या करूंगा? मुझे अभी कई दिनों यहीं आसपास भटकना है। इसलिए हे कुआं बाबा, अब तुम्हीं बताओ कि मैं क्या करूं! एक खाऊं, दो खाऊं, तीन खाऊं चारों खा जाऊं?”लेकिन कुएं की ओर से कोई जवाब नहीं मिला। वह बोल तो सकता नहीं था, इसलिए कैसे जवाब देता!

उस कुएं के अन्दर चार परियां रहती थीं। उन्होंने जब शेखचिल्ली की बात सुनी तो सोचा कि कोई दानव आया है जो उन्हीं चारों को खाने की बात सोच रहा है। इसलिए तय किया कि चारों को कुएं से बाहर निकालकर उस दानव की विनती करनी चाहिए, ताकि वह उन्हें न खाए। यह सोचकर चारों परियां कुएं से बाहर निकल आई। हाथ जोड़कर वे शेखचिल्ली से बोलीं,”हे दानवराज, आप तो बड़े बलशाली हैं! आप व्यर्थ ही हम चारों को खाने की बात सोच रहे हैं। अगर आप हमें छोड़ दें तो हम कुछ ऐसी चीजें आपको दे सकती हैं जो आपके बड़े काम आएंगी।”परियों को देखकर व उनकी बातें सुनकर शेखचिल्ली हक्के – बक्के रह गए। समझ में न आया कि क्या जवाब दे। लेकिन परियों ने इस चुप्पी का यह मतलब निकाला कि उनकी बात मान ली गई। इसलिए उन्होंने एक कठपुतला व एक कटोरा शेखचिल्ली को देते हुए कहा,”हे दानवराज, आप ने हमारी बात मान ली, इसलिए हम सब आपका बहुत – बहुत उपकार मानती हैं। साथ ही अपनी यह दो तुच्छ भेंटें आपको दे रही हैं। यह कठपुतला हर समय आपकी नौकरी बजाएगा। आप जो कुछ कहेंगे, करेगा। और यह कटोरा वह हर एक खाने की चीज आपके सामने पेश करेगा, जो आप इससे मांगेंगे।”इसके बाद परियां फिर कुएं के अन्दर चली गई।

इस सबसे शेखचिल्ली की खुशी की सीमा न रही। उसने सोचा कि अब घर लौट चलना चाहिए। क्योंकि बीवी जब इन दोनों चीजों के करतब देखेगी तो फूली न समाएगी। लेकिन सूरज डूब चुका था और रात घिर आई थी, इसलिए शेखचिल्ली पास के एक गांव में चले गए और एक आदमी से रात भर के लिए अपने यहाँ ठहरा लेने को कहा। यह भी वादा किया कि इसके बदले में वह घर के सारे लोगों को अच्छे – अच्छे पकवान व मिठाइयां खिलाएंगे। वह आदमी तैयार हो गया और शेखचिल्ली को अपनी बैठक में ठहरा लिया। शेखचिल्ली ने भी अपने कटोरे को निकाला और उसने अपने करतब दिखाने को कहा। बात की बात में खाने की अच्छी – अच्छी चीजों के ढेर लग गए। जब सारे लोग खा – पी चुके तो उस आदमी की घरवाली जूठे बरतनों को लेकर नाली की ओर चली। यह देखकर शेखचिल्ली ने उसे रोक दिया और कहा कि मेरा कठपुतला बर्तन साफ कर देगा। शेखचिल्ली के कहने भर की देर थी कि कठपुतले ने सारे के सारे बर्तन पल भर में निपटा डाले। शेखचिल्ली के कठपुतले और कटोरे के यह अजीबोगरीब करतब देखकर गांव के उस आदमी और उसकी बीवी के मन में लालच आ गया शेखचिल्ली जब सो गए तो वह दोनों चुपके से उठे और शेखचिल्ली के कटोरे व कठपुतले को चुराकर उनकी जगह एक नकली कठपुतला और नकली ही कटोरा रख दिया। शेखचिल्ली को यह बात पता न चली। सबेरे उठकर उन्होंने हाथ – मुंह धोया और दोनों नकली चीजें लेकर घर की ओर चल दिए।

घर पहुंचकर उन्होंने बड़ी डींगें हांकी और बीवी से कहा,”भागवान, अब तुझे कभी किसी बात के लिए झींकना नहीं पड़ेगा। न घर में खाने को किसी चीज की कमी रहेगी और न ही कोई काम हमें – तुम्हें करना पड़ेगा। तुम जो चीज खाना चाहोगी, मेरा यह कटोरा तुम्हें खिलाएगा और जो काम करवाना चाहोगी मेरा यह कठपुतला कर डालेगा।”लेकिन शेखचिल्ली की बीवी को इन बातों पर विश्वास न हुआ। उसने कहा,”तुम तो ऐसी डींगे रोज ही मारा करते हो। कुछ करके दिखाओ तो जानूं।”हां, क्यों नहीं?”शेखचिल्ली ने तपाक से जबाव दिया और कटोरा व कठपुतलें में अपने – अपने करतब दिखाने को कहा। लेकिन वह दोनों चीजें तो नकली थीं, अत: शेखचिल्ली की बात झूठी निकली। नतीजा यह हुआ कि उनकी बीवी पहले से ज्यादा नाराज हो उठी। कहा,”तुम मुझे इस तरह धोखा देने की कोशिश करते हो। जब से तुम घर से गए हो, घर में चूल्हा नहीं जला है। कहीं जाकर मन लगाकर काम करो तो कुछ तनखा मिले और हम दोनों को दो जून खाना नसीब हो। इन जादुई चीजों से कुछ नहीं होने का।”

बेबस शेखचिल्ली खिसियाए हुए – से फिर चल दिए। वह फिर उसी कुएं के चबूतरे पर जाकर बैठ गए। समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। जब सोचते – सोचते वह हार गए और कुछ भी समझ में न आया तो उनकी आंखें छलछला आई और रोने लगे। यह देखकर कुएं की चारों परियां फिर बाहर आयी और शेखचिल्ली से उनके रोने का कारण पूछा। शेखचिल्ली ने सारी आपबीती कह सुनाई। परियों को हंसी आ गई। वे बोलीं,”हमने तो तुमको कोई भयानक दानव समझा था। और इसलिए खुश करने के लिए वे चीजें दी थीं। लेकिन तुम तो बड़े ही भोले – भाले और सीधे आदमी निकले। खैर, घबराने की जरूरत नहीं। हम तुम्हारी मदद करेंगी। तुम्हारा कठपुतला और कटोरा उन्हीं लोगों ने चुराया है, जिनके यहाँ रात को तुम रुके थे। इस बार तुम्हें एक रस्सी व डंडा दे रही हैं। इनकी मदद से तुम उन दोनों को बांध व मारकर अपनी दोनों चीजें वापस पा सकते हो।”इसके बाद परियां फिर कुएं में चली गयीं।

जादुई रस्सी – डंडा लेकर शेखचिल्ली फिर उसी आदमी के यहाँ पहुंचे और कहा,”इस बार मैं तुम्हें कुछ और नये करतब दिखाऊंगा।”वह आदमी भी लालच का मारा था। उसने समझा कि इस बार कुछ और जादुई चीजें हाथ लगेंगी। इसलिए उसमें खुशीखुशी शेखचिल्ली को अपने यहाँ टिका लिया। लेकिन इस बार उल्टा ही हुआ। शेखचिल्ली ने जैसे ही हुक्म दिया वैसे ही उस घरवाले व उसकी बीवी को जादुई रस्सी ने कस कर बांध लिया और जादुई डंडा दनादन पिटाई करने लगा। अब तो वे दोनों चीखने – चिल्लाने और माफी मांगने लगे। शेखचिल्ली ने कहा,”तुम दोनों ने मुझे धोखा दिया है। मैंने तो यह सोचा था कि तुमने मुझे रहने को जगह दी है, इसलिए मैं भी तुम्हारे साथ कोई भलाई कर दूं। लेकिन तुमने मेरे साथ उल्टा बर्ताव किया! मेरे कठपुतले और कटोरे को ही चुरा लिया। अब जब वे दोनों चीजें तुम मुझे वापस कर दोगे, तभी मैं अपनी रस्सी व डंडे को रुकने का हुक्म दूंगा।”उन दोनों ने झटपट दोनों चुराई हुई चीजें शेखचिल्ली को वापस कर दीं। यह देखकर शेखचिल्ली ने भी अपनी रस्सी व डंडे को रुक जाने का हुक्म दे दिया।

अब अपनी चारों जादुई चीजें लेकर शेखचिल्ली प्रसन्न मन से घर को वापस लौट पड़े। जब बीवी ने फिर देखा कि शेखचिल्ली वापस आ गए हैं तो उसे बड़ा गुस्सा आया। उसे तो कई दिनों से खाने को कुछ मिला नहीं था, इसलिए वह भी झुंझलाई हुई थी। दूर से ही देखकर वह चीखी,”कामचोर तुम फिर लौट आए! खबरदार, घर के अंदर पैर न रखना! वरना तुम्हारे लिए बेलन रखा है।”यह सुनकर शेखचिल्ली दरवाजे पर ही रुक गए! मन ही मन उन्होंने रस्सी व डंडे को हुक्म दिया कि वे उसे काबू में करें। रस्सी और डंडे ने अपना काम शुरू कर दिया। रस्सी ने कसकर बांध लिया और डंडे ने पिटाई शुरू कर दी। यह जादुई करतब देखकर बीवी ने भी अपने सारे हथियार डाल दिए और कभी वैसा बुरा बर्ताव न करने का वादा किया। तभी उसे भी रस्सी व डंडे से छुटकारा मिला। अब शेखचिल्ली ने अपने कठपुतले व कटोरे को हुक्म देना शुरू किया। बस, फिर क्या था! कठपुतला बर्तन – भाड़े व जिन – जिन चीजों की कमी थी झटपट ले आया और कटोरे ने बात की बात में नाना प्रकार के व्यंजन तैयार कर दिए।

देना-एक गज दूध! (sheikh chilli ki मजेदार स्टोरी इन हिंदी)

शेखचिल्ली का बचपन अजीबोगरीब वाकयात से भरा था। शेखचिल्ली के प्रारम्भिक जीवन में सरोकारवाले बहुत कम लोग थे। एक अब्बू, दूसरी अम्मी और जब वह मदरसा जाने लगा तब तीसरे मौलाना साहब। कुल जमा तीन आदमी जिनसे शेखचिल्ली की बातें होतीं, नसीहतें मिलतीं और डाँट पड़ती। यह जरूर है कि इसके बावजूद शेखचिल्ली में हुनरमन्द और बुद्धिमान दिखने का जज्बा था।

एक दिन शेखचिल्ली ने अपनी अम्मी से कहा-“अम्मी! तुम या अब्बू मुझसे कोई काम नहीं कराते…आखिर क्यों? सभी बच्चों के अम्मी-अब्बू उनसे कोई-न-कोई काम कराते हैं मगर तुम तो मुझे कुछ करने ही नहीं देतीं! क्या मैं इतना नाकारा हूँ कि तुम या मेरे अब्बू मुझे किसी काम के काबिल नहीं समझते?”

शेखू की बात सुनकर रसीदा बेगम चैंक पड़ीं। अरे! यह छोटा बच्चा, अभी से क्या काम करेगा? अभी तो खुद से बधना भर पानी ले नहीं सकता और पूछ रहा है कि काम क्यों नहीं करातीं? मगर यह बात उन्होंने शेखचिल्ली पर प्रकट नहीं होने दी और उसे प्यार से सहलाते हुए बोलीं- “ठीक है, मेरे राजा बेटे! अब मैं तुमसे भी कोई-न-कोई काम कराती रहूँगी।”

माँ का दुलार पाकर शेखचिल्ली खुश हो गया और मदरसे से मिला सबक पूरा करने में लग गया।

दूसरे दिन सुबह जब वह मदरसा जाने के लिए निकला तो देखा, अम्मी दरवाजे पर फेरीवाले से ब्लाउज के लिए कपड़े खरीद रही हैं। उसे पास से गुजरता देखकर अम्मी ने उसे आवाज दी-“जरा इधर तो आना शेखू!”

शेखचिल्ली का भी मन था कि वह फेरीवाले के पास जाकर नए-नए कपड़े देखे। अम्मी की पुकार सुनकर वह खुश हो गया और दौड़कर अम्मी के पास पहुंच गया। अम्मी ने उससे कहा-“बेटे, देख तो इनमें से कौन-सा कपड़ा तुम्हें अच्छा लग रहा है…तुम जो कपड़ा पसन्द करोगे-मैं उसी कपड़े से अपने लिए ब्लाउज बनवाऊँगी।”

शेखचिल्ली ने एक बार रसीदा बेगम की तरफ खुश होकर देखा और फिर उसकी निगाहें फेरीवाले के कपड़ों पर दौड़ने लगीं और अन्ततः उसने लाल-लाल छापोंवाले कपड़े के थान पर अपनी अंगुली रख दी-“अम्मी, यह!”

रसीदा बेगम को भी लाल बूटोंवाला वह कपड़ा पसन्द आ गया और उसने फेरीवाले से कहा-“भैया, इसमें से एक गज निकाल दो।”

फेरीवाले ने अपने पास से एक फीता निकाला और कपड़े के किनारे पर उसे फैलाकर माप लिया और कैंची से कपड़ा काटकर रसीदा बेगम को थमा दिया।

शेखचिल्ली के लिए माप का यह शब्द ‘गज’ नया था और बाँहें फैलाकर कपड़ा मापने का तरीका भी उसके लिए नया और दिलचस्प था। ‘गज’ और हाथ फैलाकर माप लेना ये दो बातें शेखचिल्ली के दिमाग में बैठ गईं, और वह कपड़े मापे जाने के -श्य को याद करता हुआ मदरसे चला गया।

शाम को शेखचिल्ली मदरसे से वापस आया। बस्ता रखकर हाथ-मुँह धोया। तभी रसीदा बेगम ने उसे दुअन्नी थमाते हुए कहा-“बेटा, दौड़कर जाओ और कोनेवाले हलवाई से दो आने का दूध लेकर आओ!”

शेखचिल्ली ने मुट्ठी में दुअन्नी दबाई और दूध लेने के लिए एक बड़ा कटोरा चैके से लेकर दौड़कर हलवाई की दुकान पर पहुँच गया।

गाँव के कई लोग उस हलवाई के पास खड़े थे। हलवाई अपने दोनों हाथ में एक-एक मग पकड़े था और एक हाथ ऊपर करते हुए उससे गरम दुध की धार गिराता और दूसरे हाथ को नीचे कर उस दूध की धार को मग में भर लेता। फिर भरे मगवाला हाथ ऊपर करता और खाली मगवाला हाथ नीचे। यह क्रिया वह बार-बार, यंत्रावत् कर रहा था।

शेखचिल्ली के लिए यह दृश्य नया था। दूध ठंडा करने का यह तरीका उसके लिए नया था। वह समझने की कोशिश कर रहा था कि आखिर यह हलवाई क्या कर रहा है! फिर उसे सुबह की घटना याद हो आई। कपड़ावाला भी तो इसी तरह कपड़े की लम्बाई माप रहा था। उसने सोचा-यह दूधवाला जरूर दूध की लम्बाई माप रहा है। ऐसा सोचकर वह गर्वित हआ कि सही वक्त पर उसके दिमाग ने साथ दिया और वह यह समझने के काबिल हुआ कि दूधवाला क्या कर रहा है।

शेखचिल्ली को अपने पास देर से टकटकी लगाए खड़ा देखकर हलवाई ने पहले तो सोचा कि यह लड़का किसी ग्राहक के साथ आया होगा लेकिन जब पहले से खड़े ग्राहक दूध लेकर लौट गए तब भी शेखचिल्ली को वहीं खड़ा देख हलवाई ने पूछा-“ऐ लड़के! तुम्हें क्या चाहिए?”

शेखचिल्ली की तन्द्रा टूटी और उसने कहा-“दूध!” “कितना दूध चाहिए?” हलवाई ने शेखचिल्ली से पूछा। हलवाई के इस प्रश्न से शेखचिल्ली घबरा गया क्योंकि अम्मी ने तो यह बताया ही नहीं था कि कितना दूध लेना है? फिर भी अक्ल पर जोर डालते हुए उसने कहा-“एक गज दूध “हाँ!” शेखचिल्ली ने कहा और दुअन्नी हलवाई को थमा दी। हलवाई ने उसके कटोरे में दो आने का दूध डाल दिया। जब शेखचिल्ली दूध लेकर, दुकान से अपने घर की ओर चलने लगा तब उसके बढ़ते ही एक ग्राहक ने दुकानदार से जोर से कहा-“देना भैया, मुझे भी एक गज दूध!” और फिर समवेत ठहाके की गूंज शेखचिल्ली के कानों से टकराई।

शेखचिल्ली यह तो समझ रहा था कि लोग उसे चिढ़ाने के लिए हँस रहे हैं मगर वह यह नहीं समझ रहा था कि एक गज दूध माँगकर उसने ऐसा क्या कर दिया कि लोग उसे हँसी का पात्रा बनाने लगे हैं। ठहाके की आवाज अभी भी उसे पीछे से आती महसूस हो रही थी और वह लम्बे डग भरता हुआ अपने घर वापस जा रहा था…यह सोचता हुआ कि हँसो…हँसते रहो, मेरी बला से!

शेख चिल्ली चले चोरों के संग “चोरी करने” (शेख चिल्ली की मजेदार कॉमेडी कहानी)

एक बार अंधेरी रात में मियां शेख चिल्ली अपने घर की ओर चले जा रहे थे। तभी अचानक उनके पास से चार चोर गुज़रे। चुप-चाप दबे पाँव आगे बढ़ रहे चोरों के पास जा कर मियां शेख चिल्ली नें उनसे पूछा कि आप सब इस वक्त कहाँ जा रहे हैं। चोरों नें सोचा कि मियां शेख चिल्ली भी उन्ही की तरह कोई चोर है और साफ-साफ बता दिया कि हम चोर हैं और चोरी करनें जा रहे हैं।

मियां शेख चिल्ली को खयाल आया कि इन लोगों के साथ चला जाता हूँ… कुछ नया सीखने को मिलेगा। यही सोच कर उन्होने चोरों को कहा कि मुझे भी अपने साथ ले चलो।

पहले तो चोरों नें मियां शेख चिल्ली को मना कर दिया , पर बार-बार मिन्नतें करने पर उन्होने उन्हें भी साथ ले लिया। चोरों ने एक रिहाईशी इलाके में बने आलिशाना मकान में चोरी करने का फैसला किया, जिसमे एक अकेली बुढ़िया रहती थी। और फिर चारों घर के अंदर घुस गए और उनके पीछे-पीछे मियां शेख चिल्ली भी हो लिए।

चोरो नें उन्हें हिदायत दी कि जैसा हम कहें वैसा ही करना और हेमशा छुपे रहना।

घर के अंदर आते ही चारों चोर पैसों गहनों और अन्य कीमती चीजों की खोज में लग गए। मियां शेख चिल्ली की यह पहली चोरी थी और वो काफी उत्साहित थे। उन्होने सोचा कि चलो मैं भी घर में कुछ कीमती सामान ढूँढता हूँ और चोरों का हाथ बटाता हूँ।

खोज करते-करते मियां शेख चिल्ली घर के रसोई-घर पर जा पहुंचे। वहाँ से खीर पकने की खुशबू आ रही थी। मियां शेख चिल्ली के मुंह में पानी आ गया, चोरी करने का खयाल अब उनके दिमाग से पूरी तरह से जा चुका था। अब उन्हे किसी भी कीमत पर वह पक रही खीर खानी थी!

मियां शेख चिल्ली दबे पाँव चूल्हे के पास पहुंचे तो उन्होने देखा कि वहीं पास ही में एक बुढ़िया कुर्सी पर बैठी थी, जो शायद खीर पकाते-पकाते सो गयी थी।

खीर के ख्यालों में खोये मियां शेख चिल्ली भूल ही गए कि वो एक चोर हैं, उन्होंने फटा-फट एक प्लेट में खीर निकाली और मजे से खाने लगे।

वो खा ही रहे थे कई तभी अचानक कुरसी पर सो रही बुढ़िया का हाथ सीधा हो कर कुरसी से बाहर की और लहरा गया।

मियां शेख चिल्ली को लगा कि बेचारी बुढ़िया भूखी होगी, इसीलिए हाथ बाधा कर खीर मांग रही है। इसी नेक सोच के साथ उन्होने पतीले से एक प्याला खीर भर कर बुढ़िया के हाथ में रख दिया। गरम खीर के प्याले की तपन से सो रही बुढ़िया तिलमिला उठी। और चोर-चोर चिल्लाने लगी। चिल्लम-चिल्ली होने पर आस-पड़ोस के लोग जमा हो गए।

मियां शेख चिल्ली और चोर बाहर नहीं भाग सकते थे सो घर में ही इधर उधर छुप गए।

जल्द ही एक चोर पकड़ा गया। लोग उसे मार-मार कर सवाल-जवाब करने लगे?

तू यहाँ क्यों आया था?

“ऊपर वाला जाने!”

तूने क्या-क्या चुराया?

“ऊपर वाला जाने!”

इस तरह लोग कुछ भी पूछते चोर यही कहता कि ऊपर वाला यानि अल्लाह जाने।

लोगों ने सोचा कि चलो जाने दो, भले चोर है लेकिन हर बात में अल्लाह को तो याद करता है!

लेकिन तभी धडाम से आवाज़ आई….मियां शेख चिल्ली जो ठीक ऊपर दूछत्ती में छुपे थे नीचे कूद पड़े और चोर को थप्पड़ जड़ते हुए बोले….

“सारा करम तुमने और तुम्हारे तीन साथियो ने किया….लेकिन हर बात में तू मेरा नाम लगा दे रहा है….” ऊपर वाला जाने–ऊपर वाला जाने”…भाइयों मैं कुछ नहीं जानता मैं तो बस ऐसे ही इनके साथ हो लिया था…”

फिर क्या था…लोगों ने बाकी तीनो चोरों को भी खोजा और उनकी धुनाई करने लगे….और मौके का फायदा उठाते हुए मियां शेख चिल्ली पतली गली से निकल लिए! 

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